ट्रंप प्रशासन बनाम हार्वर्ड: विदेशी छात्रों को बड़ी राहत।
अमेरिका में पढ़ाई कर रहे हजारों विदेशी छात्रों के लिए एक बड़ी राहत की खबर आई है। शुक्रवार को एक संघीय जज ने ट्रंप प्रशासन के उस फैसले पर अस्थायी रोक लगा दी, जिसमें हार्वर्ड विश्वविद्यालय को विदेशी छात्रों को दाखिला देने की पात्रता से वंचित कर दिया गया था। इस फैसले से खासतौर पर भारतीय छात्रों को तात्कालिक राहत मिली है।
हार्वर्ड की याचिका पर सुनवाई के बाद मिली राहत
इस मामले में हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने बोस्टन की संघीय अदालत में याचिका दायर की थी, जिसमें कहा गया था कि ट्रंप प्रशासन का यह कदम अमेरिकी संविधान के प्रथम संशोधन का उल्लंघन है। इस पर सुनवाई करते हुए संघीय जज एलिसन बेरोज़ ने प्रशासन के आदेश पर अस्थायी रोक लगा दी। जज ने यह भी संकेत दिए कि आदेश में कई संवैधानिक खामियां हैं।
ट्रंप प्रशासन ने लिया था कठोर निर्णय
इससे पहले गृह सुरक्षा विभाग ने हार्वर्ड को एक पत्र भेजकर सूचित किया था कि विदेशी छात्रों को दाखिला देने की उसकी पात्रता को तुरंत प्रभाव से समाप्त कर दिया गया है। इस निर्णय की वजह विश्वविद्यालय में चल रही एक जांच को बताया गया, जिसमें हार्वर्ड के आंतरिक मामलों की पड़ताल हो रही थी।
भारतीय छात्रों पर था सीधा असर
ट्रंप प्रशासन के इस निर्णय से भारतीय छात्रों पर सीधा असर पड़ने वाला था। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के विभिन्न स्कूलों में 2024-25 सत्र में 788 भारतीय छात्र और शोधकर्ता पंजीकृत हैं। हर साल औसतन 500 से 800 भारतीय छात्र हार्वर्ड में पढ़ते हैं। ऐसे में प्रशासनिक फैसले ने हजारों छात्रों के भविष्य को संकट में डाल दिया था।
सरकारी मांगें और हार्वर्ड का विरोध
प्रशासन ने विश्वविद्यालय से विदेशी छात्रों के अनुशासनात्मक रिकॉर्ड, विरोध-प्रदर्शन की गतिविधियों के ऑडियो-वीडियो क्लिप्स समेत कई संवेदनशील जानकारियाँ मांगी थीं। लेकिन हार्वर्ड ने इन मांगों को यह कहकर खारिज कर दिया कि यह छात्रों की निजता का उल्लंघन है और संविधान के खिलाफ है।
नहीं मानी गई मांगें तो रद्द हुई पात्रता
गृह सुरक्षा मंत्री क्रिस्टी नोएम ने कहा कि यदि हार्वर्ड प्रशासन 72 घंटे के भीतर प्रशासन की सूचीबद्ध मांगों को नहीं मानता, तो विदेशी छात्रों को दाखिला देने की पात्रता स्थायी रूप से रद्द हो सकती है। हार्वर्ड के रुख को देखते हुए, इस पर अदालती हस्तक्षेप आवश्यक हो गया था।
जिन छात्रों की डिग्री पूरी हो रही, उन्हें राहत
प्रशासन की ओर से यह भी कहा गया था कि जिन छात्रों की डिग्री वर्तमान सत्र में पूरी हो रही है, वे स्नातक हो सकते हैं। लेकिन जिनकी पढ़ाई अभी बाकी है, उन्हें दूसरे विश्वविद्यालयों में स्थानांतरित होना होगा, अन्यथा उनकी कानूनी स्थिति अमेरिका में समाप्त हो जाएगी।
हार्वर्ड का प्रशासन से टकराव नया नहीं
यह टकराव अप्रैल 2025 से ही चल रहा है, जब हार्वर्ड ने फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनों को रोकने और विविधता व समावेश संबंधी नीतियों को खत्म करने की प्रशासन की मांगों को मानने से इनकार कर दिया था। इसके बाद से ही ट्रंप प्रशासन और हार्वर्ड के संबंधों में तनाव बढ़ता गया।
ट्रंप ने रोकी थी अरबों डॉलर की अनुदान राशि
इस महीने की शुरुआत में राष्ट्रपति ट्रंप ने हार्वर्ड को मिलने वाली शोध अनुदान और अन्य वित्तीय सहायता पर रोक लगा दी थी। उन्होंने हार्वर्ड को यहूदी विरोधी भावनाओं को बढ़ावा देने, परिसरों में हिंसा फैलाने और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से संबंध रखने का आरोप लगाया था। प्रशासन के अनुसार, हार्वर्ड सरकार की सुरक्षा नीति के खिलाफ काम कर रहा है।
चीनी और भारतीय छात्रों की संख्या काफी अधिक
हार्वर्ड के रिकॉर्ड के अनुसार, 6800 से अधिक विदेशी छात्र 100 से अधिक देशों से विश्वविद्यालय में पंजीकृत हैं। इनमें 1203 छात्र चीन से हैं, जबकि भारत के सैकड़ों छात्र और शोधकर्ता हर साल यहां अध्ययन के लिए आते हैं। ऐसे में यह फैसला अंतरराष्ट्रीय शिक्षा समुदाय पर भी बड़ा असर डाल सकता है।
फैसले के असर पर दुनिया भर की नजर
ट्रंप प्रशासन के फैसले को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भी चिंता देखी जा रही है। अमेरिका में उच्च शिक्षा हासिल करने वाले छात्रों में भारत और चीन से आने वालों की संख्या सबसे अधिक है। यदि यह फैसला स्थायी रूप से लागू होता, तो यह अमेरिका की शैक्षणिक छवि और वैश्विक सहयोग पर नकारात्मक प्रभाव डालता।
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